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MOVIE REVIEW: लिपस्टिक अंडर माई बुर्का.. दमदार.. आंखे खोल देगी ये फिल्म!

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कास्ट- कोंकणा सेन शर्मा,रत्ना पाठक शाह, आहना कुमरा, पल्बिता बोरठाकुर, सुशांत सिंह, वैभव तत्ववादी, विक्रांत मेसी, शशांक अरोड़ा
डायरेक्टर – अलंकृता श्रीवास्तव
प्रोड्यूसर – प्रकाश झा
लेखक – अलंकृता श्रीवास्तव
शानदार पॉइंट – परफॉर्मेंस, डायरेरक्शन, कहानी
निगेटिव पॉइंट – पुरुषों के किरदार में गहराई नहीं है और ये वन डायमेंशनल लगते हैं
शानदार मोमेंट – एक सीन में रत्ना पाठक शाह कॉमेडी फ्लेवर लाती हैं और आप उसका आनंद लेंगे


55 साल की बुआजी- जो धार्मिक किताबों के बीच में छुपा कर ‘वैसी वाली’ किताबें पढ़ती हैं, बुर्का सिलने वाले एक दर्जी की बुर्कानशीं बेटी जो मॉल से लिपस्टिक चुराकर सोचती है कि उसने अपने हिस्से की खुशियां चुरा ली हैं- इस तरह के सपनीली आंखों वाले किरदारों के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है, हालांकि ये किरदार जरा और सशक्त होते तो मजा आ जाता।

इस फिल्म का पोस्टर तो सेंसर बोर्ड को ही मुंह चिढ़ा रहा था, पर यह फिल्म तो उन सभी फिल्मों के मजे लेती नजर आती है, जिन्हें सेंसर बोर्ड ने आसानी से पास कर दिया था और जिसमें पुरुषों की कामुक कल्पनाओं को मनोरंजक अंदाज में पेश किया गया था। ऐसी फिल्में जिसमें कुछ लड़के लड़कियों के बारे में ‘वैसी वाली’ कल्पनाएं करते थे, जिसमें एक अधेड़ आदमी एक युवा लड़की पर मरता था… यह फिल्म भी कुछ ऐसी ही है। बस, औरत और आदमी की जगहें बदल गई हैं और यहां सवाल इन औरतों के अतिरिक्त मनोरंजन का नहीं बल्कि उनकी जिंदगी की मुसीबतों से छुटकारा पाने का और अपने वजूद को तलाशने का है।


फिल्म के किरदारों से एक सहज जुड़ाव होता है। अगर ये किरदार थोड़े और बहादुर होते, तो यह दूसरी ‘क्वीन’ बन सकती थी।
चलिए आपको मिलवाते हैं फिल्म के पात्रों से। पहली पात्र हैं विधवा ऊषा (रत्ना पाठक) जिन्हें हर कोई बुआजी कह कर पुकारता है। बुआजी भोपाल स्थित हवाई महल नामक एक पुरानी बिल्डिंग की मालकिन हैं, जिसमें बाकी के तीनों पात्र किराए पर रहते हैं। ये पात्र हैं शिरीन (कोंकणा सेन शर्मा), लीला (अहाना कुमरा) और रिहाना (पलबिता बोरठाकुर)। इस हवाई महल में इन तीनों पात्रों के हवाई सपने पलते हैं। शिरीन अपने पति (सुशांत सिंह) से छुपकर एक सेल्स गर्ल की नौकरी करती है।

हालांकि उसका पति उसे सिर्फ इस्तेमाल की चीज समझता है। उधर एक फोटोग्राफर (विक्रांत मैसी) से प्यार करने वाली लीला की शादी उसकी मां ने एक दूसरे लड़के (वैभव तातवावदी) के साथ तय कर दी है। रिहाना एक बुरखा सिलने वाले दर्जी की बेटी बनी हैं जो घर से कॉलेज के लिए निकलती तो बुरखा पहन कर है लेकिन कॉलेज में बुरखा बैग में रखकर जींस-टॉप में घूमती है, ‘जींस का हक, जीने का हक’ जैसे नारे लगाती है और माइली सायरस को अपना आदर्श मानती है। पुरुष प्रधान समाज के साये तले जी रही इन चारों औरतों की कहानी रोजी नामक एक कामुक उपन्यास की नायिका की कहानी के साथ आगे बढ़ती है, जो बुआजी पढ़ रही हैं। बुआजी की जिंदगी में उस वक्त एक नया मोड़ आता है जब उनका दिल एक युवा स्विमिंग कोच पर आ जाता है। कोच के साथ समय बिताने के लालच में वह स्विमिंग कॉस्ट्यूम खरीदती हैं, उसे रोजी के नाम से कॉल कर रोमांस से भरी बातें करती हैं।

फिल्म की सबसे बड़ी सफलता ‘लिपस्टिक वाले सपने’ उपन्यास की नायिका रोजी की कहानी से जुड़े ये चारों किरदार हैं जो हमें किसी न किसी महिला की याद दिला ही देते हैं। चारों ही किरदारों ने अपने-अपने लिपस्टिक वाले सपनों को जिंदा रखा है। हालांकि उनका इन सपनों को सच करने के लिए ज्यादा प्रयास न करना एक आम दर्शक के तौर पर कहीं न कहीं अखरता है। आप चाहते हैं कि फिल्म ‘क्वीन’ की रानी की तरह रोजी भी अपने सपनों को कुचलने वालों को मुंहतोड़ जवाब दे। पर ऐसानहीं होता। रोजी चुपचाप सारी नाइंसाफियों को सहती रहती है। फिर कहीं-कहीं आपके मन में ऐसी बातें भी आने लगती हैं कि क्या लिपस्टिक लगाने भर से बोल्डनेस आ जाती है?

फिल्म में सबसे ज्यादा हिम्मत दिखाता है रत्ना पाठक का किरदार। 55 साल की महिला जिस तरह तैराकी सीखने का फैसला करती है, अपने लिए स्विमिंग कॉस्ट्यूम की शॉपिंग करती है, जिस लड़के को पसंद करती है, उसके साथ रोमैंटिक बातें करती है, वह कई सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ती नजर आती है। वहीं कोंकणा के किरदार में उनके बतौर सेल्सगर्ल मार्केटिंग के गुण प्रभावित करते हैं। हालांकि अपनी निजी जिंदगी की ज्यादतियों का वह बहुत ज्यादा विरोध करती नजर नहीं आती हैं। पति की बेवफाई पर उससे सीधे बात करने की जगह वह उस महिला के घर पहुंच जाती हैं, जिनके साथ उनके पति का अफेयर होता है। उनकी जैसी सशक्त अभिनेत्री की यह बेबसी कुछ अखरती है। अहाना कुमरा और प्लबिता ने भी अपने-अपने किरदारों को परदे पर जीवंत तरीके से निभाया है।

पर फिर वही बात, लिपस्टिक (या खुशियां) चुराना, छुप कर प्यार करना, प्रेमी की बेरुखी पर आंसू बहाना, पति के सितम चुपचाप बर्दाश्त करना- इस तरह की ऊर्जा से भरी हुई पैकेजिंग वाली फिल्म में ‘हाय यह जालिम दुनिया’ वाला यह तेवर दिखाना कितना तर्कसम्मत है? क्या यह सब देखकर इन समस्याओं से सचमुच जूझ रही महिलाओं के मन में कोई हिम्मत बंधेगी? या उन्हें उम्मीद की कोई किरण नजर आएगी? यह एक बड़ा सवाल है। हालांकि फिल्म एक्टिंग के लिहाज से प्रभावित करती है। कुछ डायलॉग्स आपके चेहरे पर हंसी ले आते हैं। चारों मुख्य किरदारों की शानदार एक्टिंग के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है।

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