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Review रुख : ये फिल्म आपको अपनी रफ़्तार से थका देगी

न्यूटन के बाद ये दृश्यम फिल्म्स की अगली पेशकश है

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रुख देखने के बाद एक बात तो बिलकुल साफ़ हो जाती है कि इसका दर्शक वर्ग बेहद ही सीमित है. अगर आप में रुकने का साहस है तो मुमकिन है कि फिल्म का क्लाईमेक्स ख़त्म होने के बाद कुछ हद तक आपको आश्चर्यचकित होने का एहसास मिले लेकिन डिजिटल युग में 147 मिनट की इस स्लो फिल्म के आखिर तक दर्शक कैसे पहुंचेगे यह अपने आप में एक पहेली होगी.

रेटिंग- ★★★☆☆
परदे पर : 27 अक्टूबर
डायरेकटर : अटाणु मुखर्जी
संगीत : ऐंजो जॉन
कलाकार : मनोज बाजपेयी, स्मिता तांबे, आदर्श गौरव
शैली : थ्रिलर

रुख आपको सन अस्सी के दशक की उन फिल्मों की याद दिलाएगी जो बेहद ही धीमी गति से चलती थीं. अगर मैं तुलना ही करूं तो जेहन में एक दिन अचानक और एक डॉक्टर की मौत जैसी फिल्मों का ख़्याल आता है. यह दोनों ही फिल्में अपने ज़माने की बेहतरीन फिल्में थीं.

कहने का यह आशय यह कतई नहीं है कि रुख भी उसी वर्ग में आती है लेकिन अगर कहानी की रफ़्तार और माहौल की बात करें तो रुख उनकी याद ज़रूर दिलाती है. न्यूटन बनाने वाले दृश्यम फ़िल्म्स की यह अगली पेशकश है और कहना पड़ेगा की ये फिल्म न्यूटन को पार नहीं कर पाई है. फ़िल्मी मापदंडों पर यह एक खरी फिल्म है लेकिन इसकी रफ़्तार ही इसकी सबसे बड़ी दुश्मन है.

यहां पर ये कहना ज़रुरी हो जाता है कि फिल्म के निर्देशक अतानु मुखर्जी शायद थोड़े असमंजस में होंगे कि फिल्म को किस तरह का रूप दिया जाए – एक मेनस्ट्रीम कमर्शियल सिनेमा का या फिर कुछ पैरेलल फिल्मों की तर्ज़ पर.

स्टोरी

कहानी मुंबई के एक मध्यमवर्गीय परिवार के बारे में जिसके मुखिया है दिवाकर (मनोज बाजपेयी) और एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो जाता है. परिवार के सभी लोग उसे एक दुर्घटना मान लेते हैं लेकिन दिवाकर का बेटा ध्रुव (आदर्श गौरव) उसे एक हत्या मानता है. अपने बोर्डिंग स्कूल से आने के बाद वो उन सभी लोगों से मिलता है जो उसके पिता के साथ काम करते थे. इस बात का भी पता चलता है कि उसके पिता को उसकी कंपनी के पार्टनर राबिन (कुमुद मिश्रा) ने मनी लॉन्डरिंग के जाल में फंसा लिया था जिसकी तहकीकात अब सीबीआई कर रही है. सारी परतें के एक के बाद एक करके खुलती है लेकिन रुख की कहानी का अंत कुछ और तरीके से ही होता है. जाहिर सी बात है क्लाइमेक्स पर पर्दा बना रहे तो अच्छा होगा.

इस फिल्म को मनोज वाजपेयी की फिल्म कहकर इसका प्रचार किया जा रहा है लेकिन हकीक़त ये है की फिल्म में मनोज का स्पेशल अपीयरेंस है. फ्लैशबैक के सीन्स में वह आते रहते हैं जिसकी वजह से वो पूरी फिल्म में दिखाई देते है.

एक्टिंग

कुमुद मिश्रा फिल्म में मनोज वाजपेयी के कंपनी पार्टनर के रोल में है. अगर अभिनय की बात करें तो किसी भी अभिनेता ने अपने गलत पांव नहीं डाले हैं अपने-अपने किरदारों में. सभी का फिल्म में सधा हुआ अभिनय है. इसकी एक वजह ये भी है की फिल्म का मूल नेचर काफी संजीदा है यानी की मज़ाक मस्ती की किसी तरह की कोई गुंजाइश नहीं है.

अभिनय कौशल का एक ही ढर्रा पकड़कर सभी को चलना है. मनोज वाजपेयी एक थके हारे परिवार के मुखिया के रोल में काफी जंचते हैं. उनकी पत्नी के रोल में है स्मिता ताम्बे जो इसके पहले कई मराठी फिल्मों में काम कर चुकी है.

एक लाचार पत्नी के रूप में वो भी अपने रोल में फिट बैठती है. अगर स्क्रीन प्रेजेंस की बात की जाये इस फिल्म में तो वो सबसे ज्यादा आदर्श गौरव का है जो फिल्म में मनोज वाजपेयी के बेटे ध्रुव माथुर के रोल में है. उनके चेहरे के हाव भाव फिल्म के मिज़ाज से सही है.

यह फिल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कितना कारोबार करेगी इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है. लेकिन बात वहीं पर टिक जाती है कि कई बार अच्छी फिल्में चल नहीं पातीं और कई बार बकवास फिल्में सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लेती हैं.

रुख शर्तिया तौर पर आम जनता के लिए नहीं है जो मस्ती मनोरंजन के लिए फिल्में देखते हैं. बेहद ही काम बजट की यह फिल्म एक ख़ास वर्ग को ही लुभा पाएगी. रही बात की फिल्म अच्छी है या नहीं तो इसके बारे में ये कहा जा सकता है कि फिल्म के निर्देशक अपनी पहली फिल्म होने की वजह से थोड़े बहक से गए थे. साफ़ नज़र आता है की अस्सी के पैरेलल फिल्म मेकर्स का उनके ऊपर असर है. इस फिल्म में अभिनय है, कहानी है कुछ नहीं है तो वह है रफ़्तार और एक टेंशन भरा माहौल.

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